योगमाया कौन है?

योगमाया कौन है?
"मैं सभी के लिये प्रकट नही हूँ क्योंकि में अपनी शक्ति योगमाया द्वारा आच्छादित रहता हूँ।"

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ७, श्लोक २५

जब भी हम भगवान श्रीकृष्ण का जीवन वृतांत पढ़ते हैं तो हमें एक देवी के बारे में बार बार पता चलता है। दुःख की बात ये है कि उनके विषय में हमें बहुत अधिक जानकारी नहीं मिलती। उनका नाम है योगमाया। इनके बारे में सबसे अधिक पूछा जाने वाला प्रश्न है कि आखिर कौन है ये योगमाया? तो आज इस लेख में हम उन्ही के विषय में जानेंगे।

माता योगमाया का सम्बन्ध भगवान विष्णु से है। ये तो हम सभी जानते हैं कि श्रीहरि मायापति हैं। इस संसार में हमें जो कुछ भी दिखता है, हम जो कुछ भी महसूस कर सकते हैं, यहाँ तक कि जो कुछ हम सोच सकते हैं, वो सब माया ही है। वो माया भगवान विष्णु से ही उत्पन्न होती है और फिर उन्ही में लीन हो जाती है। भगवान की इसी माया से माता योगमाया जुडी हुई है।

यदि आपने भगवान विष्णु के नारायण स्वरुप को देखा हो तो आपने ये ध्यान दिया होगा कि वे सदैव योगनिद्रा में लीन रहते हैं। हम जो एकादशी का पर्व मनाते हैं वो भी उनकी इस निद्रा से सम्बंधित है। अब चूँकि भगवान नारायण योगनिद्रा में लीन रहते हैं, उस स्थिति में इस संसार का पालन उन्ही की माया करती है। उनकी उसी माया को हम योगमाया के नाम से जानते हैं।

हमारे ग्रंथों में ऐसे कई उदाहरण है जब जहाँ हम किसी निराकार शक्ति को साकार रूप में जानते हैं। माता योगमाया भी वैसी ही हैं। मूल रूप से वो निराकार हैं किन्तु साकार रूप में उन्हें एक देवी के रूप में दर्शाया जाता है। अब चूँकि माता योगमाया भगवान विष्णु की ही माया है, इसी कारण उनके हर अवतार में योगमाया का सहयोग होता ही है। यदि दशावतार की बात करें तो योगमाया का सबसे अधिक प्रभाव और वर्णन हमें श्री कृष्णावतार में देखने को मिलता है।

यदि ग्रंथो की बात की जाये तो कई पुराणों में हमें माता योगमाया के बारे में जानने को मिलता है किन्तु उनका विस्तृत वर्णन हमें श्री भागवत पुराण और देवी भागवत में मिलता है। इसके अतिरिक्त महाभारत के हमें कृष्णावतार के प्रसंग में माता योगमाया का वर्णन मिलता है। महाभारत और पुराणों के अनुसार योगमाया श्रीकृष्ण की बहन थी।

वैसे तो भगवान विष्णु के हर अवतार में उनके द्वारा की गयी माया योगमाया का ही प्रभाव है, किन्तु श्रीकृष्ण का अवतार दो चीजों के कारण विशेष है। पहला तो ये कि अपने कृष्णावतार में श्रीहरि ने जितनी माया की, उतनी और किसी और अवतार में नहीं की। और दूसरा ये कि कृष्णावतार ही एक ऐसा अवतार है जहाँ श्रीहरि के साथ-साथ योगमाया ने भी मनुष्य रूप में अवतार ग्रहण किया था।

श्री भागवत पुराण के दसवें स्कंध (पूर्वार्ध) के अध्याय १ के श्लोक २५ में योगमाया के अवतरण का प्रसंग आता है। इसमें भगवान कहते हैं - "भगवान की वो ऐश्वर्यशालिनी योगमाया भी, जिसने सारे जगत को मोहित कर रखा है, उनकी आज्ञा से उनकी लीला के कार्यसम्पन्न के लिए अंशरूप में अवतार ग्रहण करेगी।"

इसके आगे श्री भागवत पुराण के दसवें स्कंध (पूर्वार्ध) के अध्याय २ के श्लोक ६-१५ में भगवान विष्णु द्वारा योगमाया को अवतार लेने के लिए प्रेरित करने का प्रसंग आता है। इन श्लोकों में कहा गया है कि जब भगवान ने ये देखा कि यदुवंशी कंस द्वारा बहुत सताए जा रहे हैं तो उन्होंने अपनी योगमाया को आदेश दिया कि "देवी! तुम व्रज में जाओ जो गायों और ग्वालों से सुशोभित है। वही नंदबाबा के गोकुल में वसुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी निवास करती है। इस समय मेरा वो अंश जिसे शेष कहते हैं, देवकी के गर्भ में स्थित है। उसे वहां से निकालकर तुम रोहिणी के गर्भ में रख दो।"

"इसके बाद मैं अपनी सभी कलाओं के साथ अवतरित हूँगा और तुम नंदबाबा की पत्नी यशोदा के गर्भ से जन्म लेना। मैं तुम्हे वरदान देता हूँ कि तुम मनुष्यों को कोई भी वरदान देने में समर्थ होगी और वे सदैव तुम्हारी पूजा करेंगे। तुम दुर्गा, काली, अम्बिका आदि नामों से प्रसिद्ध होगी।" तब योगमाया उनकी आज्ञा मान कर पृथ्वीलोक में आयी और भगवान ने जैसा कहा था वैसा ही कहा।

आगे श्री भागवत पुराण के दसवें स्कंध (पूर्वार्ध) के अध्याय ३ के श्लोक ४५ से ५३ में योगमाया और श्रीकृष्ण के अवतरण के बारे में बताया गया है और साथ ही माता योगमाया की लीला का वर्णन है। इन श्लोकों में कहा गया है कि इतना कह कर भगवान ने अपनी योगमाया से तुरंत एक शिशु का रूप धारण कर लिया। उसी समय नन्दपत्नी यशोदा के गर्भ से योगमाया ने जन्म लिया जो भगवान की शक्ति होने के कारण उन्ही के भांति जन्म और मरण से मुक्त है। उसी योगमाया ने द्वारपाल और सभी पुरवासियों की चेतना हर ली। जब वसुदेव जी भगवान श्रीकृष्ण को गोद में लेकर बंद दरवाजों के पास पहुंचे तो योगमाया की कृपा से कारागार के सारे दरवाजे खुल गए।

इसके बाद वसुदेव श्रीकृष्ण को लेकर गोकुल चले। जिस प्रकार समुद्र ने भगवान श्रीराम को मार्ग दिया था उसी प्रकार यमुना ने श्रीकृष्ण को मार्ग दे दिया। स्वयं शेषनाग भगवान का छत्र बने हुए थे। वसुदेव ने गोकुल में जाकर देखा कि सब गोप नींद से अचेत पड़े थे। उन्होंने अपने पुत्र को यशोदा की शैय्या पर सुला दिया और उनकी पुत्री (योगमाया) को लेकर कारागार लौट आये। वहां उन्होंने उस बालिका को देवकी की शैय्या पर सुला दिया और पूर्ववत बंधनों में पड़ गए। उधर यशोदा जी को ये तो पता चला कि कोई संतान हुई है लेकिन वो पुत्र है या पुत्री, ये वो ना जान सकी क्यूंकि योगमाया ने उन्हें अचेत कर दिया था।

आगे श्री भागवत पुराण के दसवें स्कंध (पूर्वार्ध) के अध्याय ३ में माता योगमाया के प्राकट्य और उनके द्वारा कंस को चेतावनी देने का प्रसंग है। इसके अनुसार जब कंस को देवकी की संतान का पता चला तो वो तत्काल वहां आया। तब देवकी ने उससे बड़ी प्रार्थना की कि ये तो कन्या है अतः इसकी हत्या ना करो लेकिन कंस नहीं माना। उसने वो कन्या देवकी के हाथ से छीन ली और उसे जोर से एक चट्टान पर दे मारा।

किन्तु वो कोई साधारण कन्या नहीं योगमाया थी। वो तत्काल उसके हाथ से छूट कर आकाश में चली गयी और अष्टरूप धारण कर लिया। वो दिव्य माला, श्रृंगार और आभूषणों को पहने थी। उनके आठ हाथों में धनुष, त्रिशूल, बाण, ढाल, तलवार, शंख, चक्र और गदा - ये आठ आयुध थे। सिद्ध, चारण, गन्धर्व और अप्सराएं उनकी स्तुति कर रहे थे। उस समय देवी ने कंस से कहा - "रे मुर्ख! मुझे मारने से क्या होगा। तुझे मारने वाला कहीं और जन्म ले चुका है।" ये कहकर वो अंतर्धान हो गयी।

इसके बाद योगमाया की ही माया से कंस ने तत्काल अपनी बहन के चरण पकड़ लिए और उससे अपने किये की क्षमा मांगी। देवकी ने उसे क्षमा कर दिया। जब कंस वापस अपने महल आया तो उसके अपने मंत्रियों को जो कुछ भी योगमाया ने कहा था वो कहा। किन्तु उन मंत्रियों ने योगमाया की शक्ति और रहस्य ना जानते हुए उससे कहा कि वो हर नवजात शिशु को मार डालेंगे।

इसके आगे श्री भागवत पुराण के दसवें स्कंध (पूर्वार्ध) के अध्याय २९ के श्लोक १ में ये लिखा है कि श्रीकृष्ण ने गोपियों को निमित्त बना कर योगमाया की सहायता से रासलीला करने का निश्चय किया। इसमें तो माता योगमाया के माया की पराकाष्ठा बताई गयी है। इसके अनुसार जितनी भी गोपियाँ महारास के लिए आयी, श्रीकृष्ण ने योगमाया की सहायता से अपने उतने ही रूप बना लिए और सबसे साथ रास किया। योगमाया की माया ऐसी थी कि हर गोपी को यही लगता था कि श्रीकृष्ण केवल उन्ही के साथ क्रीड़ा कर रहे हैं।

श्री देवी भागवत के स्कन्द १ के अध्याय ८ में योगमाया द्वारा भगवान विष्णु को भी मोहित कर देने का प्रसंग है। इसके अनुसार त्रिदेव भी अपनी लीला करने के लिए योगमाया का ही सहारा लेते हैं। देवी भागवत के स्कन्द ४ के अध्याय १३ में पुनः विस्तार से श्रीकृष्ण और योगमाया के अवतरण का प्रसंग है। ऐसा वर्णित है कि श्रीकृष्ण अपने रूप का विस्तार कर प्रत्येक रात्रि अपनी १६१०८ के साथ व्यतीत करते थे। उनकी ये माया भी माता योगमाया के कारण ही थी। शिवपुराण में भी योगमाया का वर्णन मिलता है जहाँ उन्हें माता सती का अंश बताया गया है।

ऐसी मान्यता है कि कलियुग में वही माता योगमाया भारत भूमि की चार दिशाओं में विभिन्न रूपों और नामों से निवास कर रही हैं।
  • उत्तर: वैष्णवी (वैष्णों देवी), जम्मू काश्मीर
  • पूर्व: कामाख्या देवी, असम
  • दक्षिण: कन्यका (कन्याकुमारी), तमिलनाडु
  • पश्चिम: अम्बिका (अम्बिकामाता), गुजरात
इनके अतिरिक्त भी भारत में माता योगमाया के कई और मंदिर हैं जिनमें सबसे प्रसिद्ध है दिल्ली में स्थित योगमाया मंदिर। ऐसी मान्यता है कि ये मंदिर लगभग ५००० से ६००० वर्ष पुराना है। अर्थात इसकी स्थापना महाभारत काल में ही हुई मानी जाती है।

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